Menu

नवरात्र अौर हमारा स्वास्थ्य Navratri and our health - ayurvedguru

करनाल (आनन्द शर्मा)  - नवरात्र के व्रत से मन बुद्धि व आत्मा पवित्र होती है। हमारे तन व मन को बंधे बंधाऐ रूटीन से मुक्ति दिलाकर, एक नई दिशा की और ले जाने का मुख्य साधन है व्रत या उपवास। वास्तव में हमारे तन व मन को हवल या लालसा को सशक्त तरीके से रोकने की एक विद्या है व्रत। मनुष्य का मन अपनी सुविधानुसार एक रास्ता तय कर लेता है, वैसे तो हम इसे अनुशासन भी कहते है पर कभी-कभी भोजन व अन्य खाद्य पदार्थों के सेवक के समय हम भूल जाते हैं कि हमें क्या खाना चाहिए शरीर को जीने के लिए व आमाश्य के आकार अनुसार ही लेना चाहिए परन्तु अन्दर से इच्छा व लालसा ऐसा न करे, अधिक मात्रा में भोजन ले लेते हैं। इसलिए व्रत या उपवास हमारे बोझिल तन व अति व्यस्त मन के लिए उपहार है। यह हमारे बने बनाएं रूटीन को तोड, हमें नई दिशा में अग्रसर करता हैं।

नवरात्र व्रत का आयुर्वेद तरीका :- आयुर्वेद सदा नियमित व अल्प समय के व्रत, वह भी अपनी प्रकत और विकृति के अनुसार के लिए बताता हैं आयुर्वेद ने व्रत की महिमा बहाते हुए कहा है कि यह जठराग्रि की विकृति दूर करके पाचन तंत्र को मजबूत करता है। शरीर में जने हुए विषैले तत्वों का पाचन कर, गैस, कब्ज़, तेजाब को दूर कर शरीर में हल्कापन, स्वच्छ जिव्हा, श्वास व मन को सऊ करता है। शरीर की हर कोशिका, अंग-प्रत्यंग का शोधन, शारीरिक प्रकृति का संतुलन कर मन को मजबूत बनाने का साधन है व्रत। आयुर्वेद के अनुसार सप्ताह में एक दिन, महीने में कुछ दिन उपवास करने से शरीर सदा स्वस्थ रहता हैं।

व्रत का लाभ :- आज के वैज्ञानिक समुदाय का भी मत है कि नमक का उपयोग मात्रा से अधिक हो रहा है। जिसके कारण से शरीर में पानी का जमाव, मोटापा व उच्चरक्तचाप की एवं हदय रोगों में वृद्धि हुई है। व्रत नमक को कम करने में मदद करता हैं।

व्रत या उपवास के अन्य अनेक फायदे हैं, यह एक पूजा है ध्यान है तन व मन के लिए, मोह माया से मुक्ति के लिए यह धर्म, पूजा व पवित्रता के साथ परम तत्व परमात्मा से जोडने का भी साधन है, यह मन, आत्मा के लिए एक अध्यात्मिक खुराक है। शरीर को सम्पूर्ण स्वस्थ रखने की एक व्यवस्था भी है।

व्रत रखने के नियम :- आयुर्वेद के अनुसार शरद ऋतु में शारदीय नवरात्र आते हैं। छ: ऋतुओं में शरद ऋतु में अनेकों रोग जन्म लेते हैं क्योंकि वर्षा ऋतु में जल दूषित होता है और वातावरण में शीतलता भी रहती है, वर्षा ऋतु के बाद साफ आसमान से सूर्य की किरणें सीधे शरीर पर अपना प्रभाव डालती है जिसके कारण शरीर में पित का प्रकोप हो जाता है जिससे रोग प्रतिकारक क्षमता का हास होता है और अनेकों रोग पीलिया, त्वचा के रोग, अनेक प्रकार के ज्वर डेंगू,चिकनगुनिया, मलेरिया होते है।

गर्मी से सर्दी में प्रवेश का सन्धिकाल है शरद ऋतु इसी बदलते मौसम को ध्यान में रखकर हमारे महान ऋषि-मुनियों ने नवरात्र परम्परा को धर्म के साथ जोडा है। ग्रीष्म ऋतु के आहार विहार को धीरे-धीरे छोडते हुए, शरद ऋतु के आहार विहार को अपनाना ही नवरात्र का मुख्य उददेश्य हैं मां दूर्गा की तरह अपनी शक्तियों को संभालना व तन-मन-आत्मा से शक्तिशाली बन कर महिषासुर की भांति-रोग दोष, क्लेश, मोह माया का मर्दन करना। अपनी प्रकृति, वथ उम्र व बल के अनुसार ही व्रत उपवास रखे, दूसरों को देखकर रखने से नुकसान हो सकता है।

छोटे बम्रों, अपरिपक्र, गर्भवती, छोटे बच्चे के साथ माता, व वृद्ध जनों को व्रत नहीं रखना चाहिए, यदि रखना भी हो तो बहुत सावधानी के सार्थों अपनी शक्ति व क्षमता का अतिक्रमण न करें।

पहली बार व्रत या उपवास रखने पर सावधानियां :- पहली बार व्रत रखने वालों को छोटा व्रत करना चाहिए जैसे दिन में तीन बार भोजन का अभ्यास है तो प्रातः जूस ले, दोपहर को व्रत का हल्का भोजन व रात्रि में केवल दूध का सेवन या फल लें। पानी की कमी न हो तो लगातार पानी पीते रहे।

फिर अगले व्रत को केवल जल व्रत, जूस व्रत या फल व्रत के रूप में रखें। जीवनीय शक्ति को बढ़ाने व सजीने के लिए तरल का सेवन धीरे-धीरें करे।

व्रत में बहुत हल्का व कम मात्रा में खाना, पर इतना जितना शरीर की आवश्यकता है, अनाज को कम करें । भोजन हल्का व सुपाच्य हो। फल व डाईफूट लम्बे व्रत में अति उतम है। ताजा व चीनी रहित जूस और पानी की निरन्तर सेवन भी उतम है। सहज पचने वाले प्रोटीन जो मन दिमाग को हल्का रखते है, स्वाध्याय व पूजा में सहायक होते है। महात्मा गांधी ने इस तरह के व्रत को दिन की निर्विधन पूजा का नाम दिया है क्योंकि बिना व्रत प्रण पूजा नहीं हो सकती।

व्रत के दौरान योग व ध्यान का महत्व :- व्रत रखने से शारीरिक व मानसिक थकावट महसूस शरीर को पुनः शक्तिवान बनाता है। तन-मन व बुद्धि का शुद्धिकरण होता है। योग केवल तन मन का बुद्धि को ही शुद्ध नहीं करता बल्कि सहज भाव से अनियमित दिन चर्या खानपान को ठीक कर निर्विषिकरण करते हुए शक्तिशाली व पुर्न यौवन की तरफ ले जाता है।मन को शान्त, सुदृढ़, व अनेक क्षमताओं से भरपूर कर जीवन में सफलता प्रदान करता है।

इन 2016 के शरदीय नवरात्रों को हम आनन्द व श्रद्धा से मनाते हुए, स्वयं को शक्तिशाली, बलशाली बनाते हुए, देश के प्रति कर्तव्य भाव रखकर, शहीदों के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हुए, वीर सैनिकों की तरह, देश में उपस्थित हर बुराई, आतंकवाद, द्वेष भाव, भ्रष्टाचार, दुराचार आदि दैत्यों का सर्वनाश करने का संकल्प ले। यही मां जगदम्बे, भारत माता व अपनी जननी माता के प्रति सच्ची सेवा होगी। अपनी बेटी, बहन की सुरक्षा हमारा परम धर्म है तभी कंजक पूजन को सार्थकता मिलेगी।

। जय माता दी ।

डॉ मनोज विरमानी आयुर्वेद गुरु

मनोनीत सदस्य भारतीय चिकित्सा परिषद हरियाणा सरकार

संरक्षक मां झण्डेवाली सेवा समिति, करनाल

Share this Post!